खोती जा रही कबिता

Posted : July 26, 2009 at 9:35 pm [IST]

मेरी कबितायें कुछ खो गईं
कुछ कम्प्यूटर के पटल पर
विलीन हो गयीं
क्या इसे भी उम्र पर
डाल दूं ?
इच्छा होने पर भी
कबिता अब ढलती नहीं
कभी गुनगुनाने का
मन ही नहीं बनता
अब वैसी सुन्दर
न बारिस होती है
न अशोक के पेड़
झूमते हैं .
न तारें कुछ कहते हैं
न चाँद कंहीं गुदगुदाता है
अब चारों तरफ
पानी जमा पिच्छल
जमीन है
और सीमा बनाती दीवार
का बंधन है
पानी का ठहराव है
कुछ सोचने पर भी
लगता है पाबंदी है
कैसे शूरूं करुँ
क्या लिखूं आगे?
कबिता ने बनाई थी
अपनी एक अलग पहचान
कहाँ वह खो गई
चली गई
क्या कभी वापस आएगी
इन्तजार करुँ
नियति का आसरा ले
शायद इस उम्र के उस पार
मिलेगी कविता फिर

- Indra

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