शिकायत से स्वीकृति तक
Posted : August 22, 2009 at 6:47 pm [IST]
अमित गरल जीवन भर पीकर
कहो कहाँ मैं शिव हो पाया
कठिन परिश्रम पागलपन तक
कहो कहाँ कब शिखर झुकाया
सदा चला अपने हीं पथ पर
शायद वह पथ उन्हें न भाया.
सपने देखा और दिखाया
राह चला और राह बनाया.
अपने आगे की थाली को
उन्हें खिलाकर
अपने ही सुन्दर बस्त्रों से
उन्हें सजाकर
कठिन परिश्रम से अर्जित धन
उन्हें लूटा कर
उन्हें सजाया उन्हें बनाया
मेरी पूजा, मेरी मन्नत
तुम सब हित हो
यही सदा मैं करता आया
फिर क्यों नहीं भरोसा पाया
नहीं किसी को खुश कर पाया
साथ नहीं पर कोई आया .
पर क्यों सोचूँ ?
क्या खोया हूँ क्या हूँ पाया?
नहीं देव! यह नहीं शिकायत
आज सत्य समझ हूँ पाया
तुम ही सब हो
सदा रहे हो पास हमारे
थक थक कर जब मैं सोया हूँ
तुम्ही जगाये, तुम्ही चलाये
तुम पाने की आश जगाये
और दिलाये
और देव ! मैं सच कहता हूँ
सब कुछ पाया.
- Indra
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1 Comment »
This is one of the best poems I have ever read. I am very impressed and touched by it.
hope to read many more such masterpieces !!!
best regards
Manoj
Posted by: Manoj Kumar, Dubai, UAE at August 26, 2009 @ 4:53 pm
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