मेरा आज का जीवन
Posted : December 13, 2009 at 6:01 pm [IST]
चिर सुख की आश नहीं जब
चिर सुख की प्यास नहीं अब
कुछ गीत लिए ओठों पर
बस राह गुजर जाये यह
क्या सुन्दर थे सब दिन वे
क्या शांतिमयी वे रातें
सपने थे नहीं सताते.
जब कठिन प्रश्न को हल कर
मन फूला नहीं समाता.
हुगली के तट पर बैठे
आनंद मग्न हो कर के
कुछ दूर निहारा करना
नावों का आना जाना
वह सूरज का डूब जाना
बोझिल कदमों से चलकर
फिर लौट घर आ जाना
दादा दादी का आंचल
सब दुःख दर्द का नाशक
क्या सुखमय था वह जीवन
अब नहीं किसी से लेना
और नहीं किसी का देना
अपने में सिमट सिमट कर
यह हंसते रोते जीना
निस्पृह बनने की फिर भी
एक कोशिश करते जाना
जीवन का मंत्र यही है
यही जीवन की परिभाषा
- Indra
Category: Uncategorized |
4 Comments »
अब नहीं किसी से लेना
और नहीं किसी का देना
———-
इस बराबर की बैलेंस-शीट का तो कितना इन्तजार है! फिर जो होगा, स्वान्त: सुखाय होगा!
बहुत सुन्दर कविता है!
Posted by: ज्ञानदत्त पाण्डेय at December 13, 2009 @ 8:40 pm
Sarvesh Upadhyay commented on your note “मेरा आज का जीवन”:
“Sir,
I don’t know why I felt sad when I read this poem. This facebook is Hugli and we all come to you whenever you post (walk here). “
Posted by: Indra at December 14, 2009 @ 5:20 pm
प्रिय सर्वेश
कविता मन की अभिब्यक्ति है. उस पर प्रश्न मैं खुद भी नहीं करता. और हर क्षण की स्थिति अलग अलग होती है वही लिख जाता हूँ
चाहता हूँ हरदम प्रसन्न अभिब्यक्ति ही पर कभी कभी जब मन बहूत उदाश हो जाता है निराशा भी अभिब्यक्ति पा जाती है शब्दों के रूप में कबिता में
आशा है मैं कुछ समझा पाया .
Posted by: Indra at December 14, 2009 @ 5:30 pm
Ati Sundar Papa.
Posted by: Indra at December 16, 2009 @ 10:00 pm
Leave a Comment