बिश्राम का हक़
Posted : December 27, 2009 at 6:47 pm [IST]
ले लूं अब बिश्राम
नहीं गंतब्य दूर
जो जाना.
कंटकमय औ पथरीली
थीं कष्टसाध्य सब राहें
ना संग मिले कुछ वैसे
जो हाथ बढ़ा हीं देते.
पर बाक्य बाण से अपने
वे दु:खी किये अंतर तक.
पर नहीं रूका था फिर भी
हर जगह छाप मैं छोड़ा
औ’ नाम था अपना जोड़ा
हर बाधाओं को तोडा.
कुछ नयी सांस लेकर मैं
एक नयी आश लेकर जब
अपना पथ आगे देखा.
सब सहज सरल था पाया
अब नहीं रही कुछ चाहत
है शांतिमयी यह राहत
बिश्राम तो मेरा हक़ है
उठ कर फिर चल लूंगा.
- Indra
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